॥ अन्तःकरण प्रबोधिनि ॥

 

अन्तःकरण! मद्वाक्यं सावधानतया श्रुणु।

कृष्णात्परं नास्ति देवं वस्तुतो दोषवर्जितं॥ (१)

भावार्थ:- हे मेरे अन्तःकरण! मेरे शब्दों को सावधान होकर सुन, इस संसार में वास्तव में श्रीकृष्ण से बढ़कर अन्य कोई दोष-रहित देवता नहीं है। (१)

चाण्डाली चेद्राजपत्नी जाता राज्ञा च मानिता।

कदाचिदपमानेऽपि मूलतः का क्षतिर्भवेत्॥ (२)

भावार्थ:- जिसप्रकार रानी से सम्मानित नीच जाति की स्त्री का यदि राजा के द्वारा कभी अपमान हो जाता है तो वास्तविकता में उस स्त्री की कोई हानि नहीं होती है।। (२)

समर्पणादहं पूर्वमुत्तमः किं सदा स्थितः।

का ममाधमता भाव्या पश्चात्तापो यतो  भवेत्॥ (३)

भावार्थ:- उसीप्रकार भगवान के शरणागत होने से पहले क्या सदैव इस अवस्था में स्थित था? तो फिर अपनी अधमता का क्या विचार करना जिससे पश्चात्ताप हो। (३)

सत्यसंकल्पतो विष्णु-र्नान्यथा तु करिष्यति।

आज्ञैव कार्या सततं स्वामिद्रोहोऽन्यथा भवेत्॥ (४)

भावार्थ:- सत्य संकल्पित भगवान श्रीविष्णु निश्चय ही कुछ भी गलत नहीं करेंगे, इसलिये निरंतर उनकी आज्ञा का पालन करना ही कर्त्तव्य है, इसके विपरीत कुछ भी करना भगवान से द्रोह होगा। (४)

सेवकस्य तु धर्मोऽयं स्वामी स्वस्य करिष्यति।

आज्ञा पूर्व तु या जाता गंगासागरसंगमे॥ (५)

भावार्थ:- सेवक का यही एकमात्र धर्म है, बाकी तो स्वामी स्वयं ही करेंगे, जैसा कि पूर्व में गंगासागर के तट पर जो आज्ञा हुई थी। (५)

यापि पश्चान्मधुवने न कृतं तद्द्वयं मया।

देहदेशपरित्यागः तृतीयो लोकगोचरः॥ (६)

भावार्थ:- वही आज्ञा बाद में मधुवन में भी हुई थी जिसका मेरे द्वारा पालन नहीं हुआ था, वह शरीर, स्थान और आँखो से दिखाई देने वाले संसार की आसक्ति का त्याग करने की थी। (६)

पश्चात्तापः कथं तत्र सेवकोऽहं न चान्यथा। 

लौकिकप्रभुवत्कृष्णो न द्रष्टव्यः कदाचन॥ (७)

भावार्थ:- इसका भी पश्चात्ताप क्या करना, भगवान के सेवक के अतिरिक्त मैं कुछ भी नहीं हूँ, भगवान श्रीकृष्ण को कभी भी सांसारिक दृष्टि से न देखना। (७)

सर्वं समर्पितं भक्त्या कृतार्थोऽसि सुखी भव।

प्रौढापि दुहिता यद्वत्-स्नेहान्न प्रेष्यते वरे॥ (८)

भावार्थ:- सब कुछ प्रभु को समर्पित करके भक्ति-भाव से कृतार्थ होकर सुखी हो जा, जिसप्रकार माता-पिता कन्या के वयस्क होने के बाद स्नेह-पूर्वक उसको उसके पति को सोंपकर सुखी हो जाते हैं। (८)

तथा देहे न कर्तव्यं वरस्तुष्यति नान्यथा।

लोकवच्चेत्स्थितिर्मे स्यात् किं स्यादिति विचारय॥ (९)

भावार्थ:- शरीर के कर्तव्यों के साथ ऎसा नहीं करना चाहिये अन्यथा प्रभु प्रसन्न नही होंगे, सोच समझकर यह तो विचार कर कि ऎसी स्थिति में संसार की अवस्था क्या होगी। (९)

अशक्ये हरिरेवास्ति मोहं मा गाः कथंचन। 

इति श्रीकृष्णस्यदासस्य वल्लभस्य हितं वचः। 

चित्तं प्रति यदाकर्ण्य भक्तो निश्चिन्ततां व्रजेत्॥ (१०)

भावार्थ:- आशंकाओं और मोह से मुक्त केवल हरि की ही भक्ति में स्थित भगवान श्रीकृष्ण के सेवक वल्लभ के इन कल्याणकारी वचनों को मन में धारण करके समस्त भक्त चिंताओं से मुक्त हो जाते हैं। (१०)

॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥

Comments

Popular posts from this blog

॥ चतुःश्लोकी स्तुति ॥

॥ काशी विश्वनाथाष्टकम ॥

॥ धन्याष्टकम् ॥