तत्ज्ञानं प्रशमकरं यदिन्द्रियाणां, तत्ज्ञेयं यदुपनिषत्सुनिश्चितार्थम्। ते धन्या भुवि परमार्थनिश्चितेहाः, शेषास्तु भ्रमनिलये परिभ्रमंतः॥ (१) भावार्थ : ज्ञान वही होता है, जिससे इन्द्रियों की चंचलता शांत होती है, जानने योग्य वही होता है जिसका अर्थ उपनिषदों द्वारा सुनिश्चित किया गया है। जिन लोगों का इस पृथ्वी पर परमार्थ ही एक मात्र निश्चित उद्देश्य होता है, वही ईश्वर के कृपा-पात्र होते हैं, बाकी लोग तो इस मोह रूपी संसार में भ्रमित होकर घूमते ही रहते हैं। (१) आदौ विजित्य विषयान्मोहराग, द्वेषादिशत्रुगणमाह्रतयोगराज्याः। ज्ञात्वा मतं समनुभूयपरात्मविद्या, कांतासुखं वनगृहे विचरन्ति धन्याः॥ (२) भावार्थ : जो लोग मोह, राग, द्वेष आदि शत्रुओं और विषयों की इच्छा को आरंभ में ही जीत कर योग साधना में प्रवृत्त हो जाते हैं। जो लोग ज्ञान के द्वारा ब्रह्म का अनुभव करके आत्म-विद्या रूपी पत्नी के साथ एकान्त रूपी घर में शान्ति-पूर्वक रहते हैं, वही ईश्वर के कृपा-पात्र होते हैं। (२) त्यक्त्वा गृहे रतिमधोगतिहेतुभूताम्, आत्मेच्छयोपनिषदर्थरसं पिबन्तः। वीतस्पृहा विषयभोगपदे विरक्ता, धन्याश्चरंत...
सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो व्रजाधिपः। स्वस्यायमेव धर्मो हि नान्यः क्वापि कदाचन॥ (१) भावार्थ : प्रत्येक क्षण सम्पूर्ण मन-भाव से ब्रज के अधिपति भगवान श्रीकृष्ण का ही स्मरण करना चाहिए, मनुष्य के लिए इसके अतिरिक्त और कुछ भी कर्म नहीं है, केवल यही एक मात्र धर्म है। (१) एवं सदा स्वकर्तव्यं स्वयमेव करिष्यति। प्रभुः सर्व समर्थो हि ततो निश्चिन्ततां व्रजेत् (२) भावार्थ : भगवान ही सर्वशक्तिमान हैं, इस बात को ध्यान में रखते हुए चिन्ता मुक्त होकर सदैव अपने कर्तव्यों का ही पालन करते रहना चाहिए, । (२) यदि श्रीगोकुलाधीशो धृतः सर्वात्मना हृदि। ततः किमपरं ब्रूहि लोकिकैर्वैदिकैरपि॥ (३) भावार्थ : सभी के आत्म-स्वरुप गोकुल के राजा भगवान श्रीकृष्ण को यदि आपने अपने ह्रदय में धारण किया हुआ है तो इससे बढ़कर अन्य कोई सांसारिक और वैदिक कार्य नहीं हो सकते हैं। (३) अतः सर्वात्मना शश्ववतगोकुलेश्वर पादयोः। स्मरणं भजनं चापि न त्याज्यमिति मे मतिः॥ (४) भावार्थ : इसी कारण सभी के आत्म-स्वरुप गोकुल के अविनाशी ईश्वर श्रीकृष्ण के चरणों का स्मरण और भजन कभी नहीं छोड़ना चाहिए, ऐसा श्रीवल्लभाचार्य जी का कथन...
Comments
Post a Comment